शुद्ध उच्चारण और श्लोक-पाठ सीखने हेतु सामान्य सरल सूत्र


स्वर बोलने में जितना समय (मात्रा-काल) लगता है, उसी आधार पर स्वरों के दो भेद हैं।

ह्रस्व स्वर (Short vowels)

जिन्हें बोलने में एक मात्रा जितना (कम) समय लगे।

, , , , — ये पाँच ह्रस्व स्वर हैं।

दीर्घ स्वर (Long vowels)

जिन्हें बोलने में ह्रस्व से दोगुना समय लगे, यानी दो मात्रा

, , , , , , , — ये दीर्घ स्वर हैं।

सरल तरीक़ा याद रखने का: “अ इ उ” को तेज़ी से बोलें तो ह्रस्व लगेगा, और “आ ई ऊ” को खींचकर बोलें तो दीर्घ लगेगा। बोलने में लगने वाला समय ही मूल पहचान है। उच्चारण ऐसा होना चाहिए कि सुनकर ही शुद्ध शुद्ध लिखा भी जा सके।

नोट – इन दोनों के अलावा प्लुत् नाम का भी एक स्वर भेद होता है जिसका उच्चारण काल तीन मात्रा के बराबर होता है।


अब बात आती है छन्द रचने-पढ़ने की। छन्द में हर अक्षर (syllable) को दो में से एक श्रेणी में रखा जाता है:

  • लघु — हल्का अक्षर, चिह्न (या “I”)
  • गुरु — भारी अक्षर, चिह्न ‘ S ‘

ध्यान दें — यहाँ बात सिर्फ़ स्वर की नहीं, पूरे अक्षर (व्यंजन+स्वर, या उसके आगे-पीछे क्या है) की होती है। इसलिए एक ह्रस्व स्वर वाला अक्षर भी कभी-कभी गुरु बन जाता है।

लघु अक्षर कब होता है?

कोई अक्षर लघु तभी माना जाता है जब —

  • उसमें ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ऌ) हो, और
  • उसके ठीक बाद कोई संयुक्त व्यंजन (जुड़े हुए दो व्यंजन), अनुस्वार या विसर्ग न आए।

उदाहरण: कमल शब्द में क, म, ल तीनों लघु हैं — क् (। ), म (। ), ल (। )।

लघु और गुरु का उच्चारण कैसे होता है?

यह सिर्फ़ काग़ज़ पर लगाया गया चिह्न नहीं है — पाठ (recitation) करते समय दोनों का उच्चारण सचमुच अलग होता है:

  • लघु अक्षर को बोलने में एक मात्रा जितना, यानी बहुत त्वरित समय लगता है — जैसे उँगली चुटकी बजाने में लगने वाला पल। स्वर पर कोई ज़ोर या ठहराव नहीं दिया जाता।
  • गुरु अक्षर को बोलने में लघु से दोगुना समय लगता है — स्वर को थोड़ा खींचकर, भार देकर बोला जाता है, मानो उस पर हल्का ठहराव हो।

जब कोई श्लोक या छन्द लय में पढ़ा जाता है, तो यही लघु-गुरु का उतार-चढ़ाव उसकी गति (rhythm) बनाता है — गुरु अक्षर पर आवाज़ थोड़ी टिकती है, लघु अक्षर तेज़ी से निकल जाते हैं। इसी क्रम को बार-बार दोहराने से छन्द की विशिष्ट चाल (जैसे इन्द्रवज्रा की चाल, या दोहे की चाल) बनती है।


नियम 1 — दीर्घ स्वर हो तो गुरु जिस अक्षर में दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) हो, वह अपने-आप गुरु बन जाता है। उदाहरण: रामा में “रा” और “मा” दोनों गुरु (S S)।

नियम 2 — ह्रस्व स्वर के बाद संयुक्ताक्षर हो तो गुरु अगर स्वर ह्रस्व है, पर उसके तुरंत बाद दो व्यंजन जुड़कर आएँ (जैसे क्त, न्द, स्त, र्म), तो वह ह्रस्व अक्षर भी गुरु मान लिया जाता है। उदाहरण: सत्य में “स” ह्रस्व है पर उसके बाद “त्य” संयुक्त है, इसलिए “स” गुरु (S) होगा।

नियम 3 — अनुस्वार या विसर्ग हो तो गुरु जिस अक्षर पर अनुस्वार (ं) या विसर्ग (ः) लगा हो, वह चाहे ह्रस्व हो या दीर्घ, गुरु ही माना जाता है। उदाहरण: हंस में “हं” गुरु; मनः में “नः” गुरु।

नियम 4 — चरण/पद के अंत का अक्षर छन्द के हर चरण (पंक्ति) के अंतिम अक्षर को विकल्प से गुरु मान लिया जाता है, चाहे वह वास्तव में ह्रस्व ही क्यों न हो।


शब्द लें — विद्यालय”

अक्षरस्वरआगे क्या हैनिर्णयचिह्न
विह्रस्व (इ)ठीक बाद द्य” आता है — द् + य मिलकर संयुक्ताक्षर हैनियम 2 से गुरुS
द्यादीर्घ (आ)नियम 1 से गुरुS
ह्रस्व (अ)आगे केवल “य”, कोई संयुक्त नहींलघु
ह्रस्व (अ), पर शब्द/पद का अंतिम अक्षरयदि यह छन्द-पंक्ति के अंत में हो तो नियम 4 से गुरु, अन्यथा लघु हीप्रसंगानुसार। या S

तो विद्यालय की मात्रा-रचना हुई : S S । (।/S)

ध्यान दें — “वि” यहाँ ह्रस्व स्वर होते हुए भी गुरु है, क्योंकि उसके ठीक बाद “द्य” जैसा संयुक्ताक्षर आ रहा है (नियम 2)। यही वह जगह है जहाँ लोग अक्सर चूक जाते हैं — स्वर देखकर मत तय करें, यह भी देखें कि आगे क्या आ रहा है।

इसी तरह पूरे छन्द/श्लोक की हर पंक्ति के अक्षरों को लघु-गुरु में बाँटकर ही यह तय होता है कि वह कौन-सा छन्द (जैसे इन्द्रवज्रा, उपजाति, वसन्ततिलका, शार्दूलविक्रीडित आदि) है, क्योंकि हर छन्द का एक निश्चित लघु-गुरु क्रम होता है।


स्वरों में उदात्त, अनुदात्त, स्वरित ये तीन बाह्य प्रयत्न होते हैं।

  1. जिन स्वर वर्णों का उच्चारण करते समय मुँह के भीतर कंठ, तालु आदि स्थानों के ऊपरी भाग का उपयोग होता है, उन्हें उदात्त कहते हैं। पाणिनीय सूत्र है – ‘उच्चैरुदात्तः’।
  2. जिन स्वर वर्णों का उच्चारण स्थान कंठ, तालु आदि के निचले भाग से होता है, उन्हें अनुदात्त कहते हैं। पाणिनीय सूत्र है – ‘नीचैरनुदात्तः’।
  3. जहाँ उदात्त और अनुदात्त दोनों स्वरों का मेल या समाहार होता है, वह स्वरित कहलाता है। पाणिनीय सूत्र है –  ‘समाहारः स्वरितः’।

       परंपरागत शिक्षाशास्त्र (Sanskrit phonetics) में व्यंजन के उच्चारण को समझने के लिए दो अलग-अलग कसौटियाँ (एक साथ काम करने वाली) होती हैं, और इन्हीं दोनों को मिलाकर हर व्यंजन का पूरा “प्राण-चरित्र” बनता है:

(क) श्वास-नाद भेद (घोष-अघोष) — स्वर-तंत्रियाँ काँपती हैं या नहीं

  • अघोष / श्वास वर्ण — बोलते समय गले की स्वर-तंत्रियाँ (vocal cords) नहीं काँपतीं, केवल साँस निकलती है।
  • घोष / नाद वर्ण — बोलते समय स्वर-तंत्रियाँ काँपती हैं, आवाज़ में गूँज (नाद) होती है।

आसान परीक्षण: गले पर हाथ रखकर बोलें — कंपन महसूस हो तो घोष, न हो तो अघोष।

(ख) अल्पप्राण-महाप्राण भेद — कितनी साँस निकलती है

महाप्राण वर्णों में साँस का झोंका (जैसे “ह” जैसी फुसकार) साथ निकलता है, अल्पप्राण में नहीं।

क्रमउदाहरण (क-वर्ग)घोष/अघोषअल्पप्राण/महाप्राण
1ला अक्षरअघोषअल्पप्राण
2रा अक्षरअघोषमहाप्राण
3रा अक्षरघोषअल्पप्राण
4था अक्षरघोषमहाप्राण
5वाँ अक्षरघोषअल्पप्राण (+ अनुनासिक)

यही पैटर्न बाक़ी चार वर्गों पर भी लागू होता है:

  • च-वर्ग: च (अघोष-अल्पप्राण), छ (अघोष-महाप्राण), ज (घोष-अल्पप्राण), झ (घोष-महाप्राण), ञ (घोष-अल्पप्राण, अनुनासिक)
  • ट-वर्ग: ट, ठ, ड, ढ, ण — क्रम वही
  • त-वर्ग: त, थ, द, ध, न — क्रम वही
  • प-वर्ग: प, फ, ब, भ, म — क्रम वही

शेष व्यंजन

  • , , , (अंतःस्थ) — सभी घोष, अल्पप्राण
  • , , (ऊष्म/सिबिलेंट) — सभी अघोष, महाप्राण
  • घोष, महाप्राण

पाँचवाँ अक्षर अलग क्यों है — अनुनासिक

हर वर्ग का पाँचवाँ अक्षर (ङ, ञ, ण, न, म) एक और विशेष गुण रखता है — अनुनासिक, यानी बोलते समय हवा का कुछ भाग नाक से भी निकलता है (साथ ही घोष व अल्पप्राण भी होते हैं)। बाक़ी सारे व्यंजन अननुनासिक (मौखिक) होते हैं — हवा केवल मुँह से निकलती है।

संक्षेप में: किसी भी व्यंजन का पूरा उच्चारण-परिचय इन तीन बातों से मिलकर बनता है — (1) घोष या अघोष, (2) अल्पप्राण या महाप्राण, (3) अनुनासिक या अननुनासिक (केवल पाँचवें अक्षरों में)। ये तीनों छन्द के लघु-गुरु से पूरी तरह स्वतंत्र हैं — इनका प्रभाव केवल शब्द के उच्चारण की गुणवत्ता पर पड़ता है, उसके छन्द-मान पर नहीं।

बातह्रस्व/लघुदीर्घ/गुरु
स्वर (मूल)अ इ उ ऋ ऌआ ई ऊ ॠ ए ऐ ओ औ
मात्रा-काल1 मात्रा2 मात्रा
चिह्न। (लघु)S (गुरु)
कब गुरु बनता है (ह्रस्व होते हुए भी)संयुक्ताक्षर से पहले, अनुस्वार/विसर्ग सहित, चरणांत में
घोष-अघोष / अल्पप्राण-महाप्राण से संबंधकोई संबंध नहीं — यह उच्चारण-गुण का अलग वर्गीकरण हैकोई संबंध नहीं

अब भाग 1 की शास्त्रीय जानकारी को असल में बोलते समय कैसे उतारें, यह सात सूत्रों में सीखेंगे।

सूत्र 1 — हर ध्वनि सही “स्थान” से बोलें (उच्चारण-स्थान की शुद्धता)

उच्चारण-स्थानकहाँ से बोलेंकौन-से वर्ण
कण्ठ्यगले सेअ, आ, क, ख, ग, घ, ङ, ह
तालव्यतालु (मुँह की छत) सेइ, ई, च, छ, ज, झ, ञ, य, श
मूर्धन्यमूर्धा (तालु का ऊपरी उठा भाग) से जीभ मोड़करऋ, ट, ठ, ड, ढ, ण, र, ष
दन्त्यदाँतों से जीभ छुआकरत, थ, द, ध, न, ल, स
ओष्ठ्यदोनों होंठों सेउ, ऊ, प, फ, ब, भ, म
दन्तोष्ठ्यनिचला होंठ ऊपरी दाँतों से छूकर

पहचान का तरीक़ा: धीरे-धीरे हर वर्ण बोलकर देखें — जीभ या होंठ कहाँ छू रहे हैं, यही उसका सही स्थान है।

आम ग़लती: मूर्धन्य (ट, ठ, ड, ढ, ण, ष) और दन्त्य (त, थ, द, ध, न, स) को गड्डमड्ड कर देना — जैसे “ण” को “न” जैसा बोल देना। जीभ को मूर्धा तक मोड़कर बोलने का सायास अभ्यास करें।


भाग 1 में बताए गए ह्रस्व (1 मात्रा) और दीर्घ (2 मात्रा) के भेद को पाठ में बिना घटाए-बढ़ाए निभाएँ।

आम ग़लती: बोलचाल के प्रभाव में ह्रस्व स्वर को खींचकर दीर्घ जैसा बोलना (जैसे “गति” को “गती” जैसा), या दीर्घ को जल्दी में छोटा कर देना।

अभ्यास विधि: हर स्वर बोलते समय हाथ से एक बार (ह्रस्व) या दो बार (दीर्घ) हल्की थपकी दें। धीरे-धीरे यह गिनती अपने-आप ज़बान पर चढ़ जाएगी।


भाग 1 के 4 नियमों के अनुसार जो अक्षर गुरु बनता है, उस पर पाठ करते समय आवाज़ को हल्का ठहराव दें (स्वर को ज़रा खींचें); लघु अक्षर तेज़ी से निकाल दें। इसी उतार-चढ़ाव से छन्द की लय (जैसे अनुष्टुप, इन्द्रवज्रा, दोहा) अपने-आप उभरती है।

आम ग़लती: पूरी पंक्ति को एक ही रफ़्तार में बोल देना, जिससे लय टूट जाती है।


जब दो व्यंजन बिना स्वर के जुड़कर आते हैं (जैसे स्व, त्य, न्द, र्म), तो जल्दबाज़ी में लोग एक व्यंजन निगल जाते हैं।

उदाहरण: “स्वस्ति” में “स्व” के दोनों व्यंजन (स् + व) साफ़ सुनाई देने चाहिए — केवल “सस्ति” जैसा नहीं।

अभ्यास विधि: संयुक्ताक्षर वाले शब्द को पहले बहुत धीरे, व्यंजन अलग-अलग करके बोलें (स् – व – स्ति), फिर धीरे-धीरे गति बढ़ाकर जोड़ें।


  • अनुस्वार (ं) — हल्की नासिक्य गूँज के साथ बोला जाता है (जैसे “हंस” में)।
  • विसर्ग (ः) — हल्के “ह” जैसी श्वास-ध्वनि के साथ बोला जाता है (जैसे “नमः” में)। इसे पूरी तरह छोड़ देना (जैसे “नम” बोलना) आम ग़लती है, और इससे कई बार अर्थ भी बदल जाता है।

अभ्यास विधि: अनुस्वार वाले और बिना अनुस्वार वाले शब्द की जोड़ी बनाकर तुलना करें (जैसे “हस” बनाम “हंस”) — फ़र्क़ साफ़ सुनाई देगा।


भाग 1 में बताई गई घोष-अघोष और अल्पप्राण-महाप्राण की तालिका को अब असल में बोलकर परखें —

  • घोष-अघोष: गले पर हाथ रखकर बोलें — कंपन महसूस हो तो घोष (जैसे ग, ज, द, ब), न हो तो अघोष (जैसे क, च, त, प)। “गाना” और “काना” के फ़र्क़ को ध्यान से सुनें।
  • अल्पप्राण-महाप्राण: एक हाथ मुँह के सामने रखकर महाप्राण वर्ण (ख, घ, छ, झ आदि) बोलें — हथेली पर हवा का हल्का झोंका महसूस होना चाहिए। अल्पप्राण (क, ग, च, ज आदि) में यह झोंका नहीं आता। “काम” और “खाम” के बीच फ़र्क़ इसी से आता है।

हर छन्द में एक निश्चित जगह पर साँस लेने/रुकने का स्थान तय होता है, जिसे यति कहते हैं। ग़लत जगह रुकने से अर्थ और लय दोनों बिगड़ जाते हैं।

उदाहरण: दोहा छन्द में हर पंक्ति के 13वीं और 11वीं मात्रा के बाद यति होती है — वहीं हल्का ठहराव स्वाभाविक लगता है।

अभ्यास विधि: पहले किसी जानकार से या श्रव्य पाठ (audio) सुनकर यह जान लें कि किस छन्द में यति कहाँ पड़ती है, फिर उसी जगह हल्का ठहराव देकर अभ्यास करें।


  1. धीमी गति से शुरू करें — पहले हर अक्षर को अलग-अलग, बहुत धीरे बोलें, मात्रा और स्थान पर ध्यान देते हुए।
  2. ताल दें — हाथ से थपकी या ताली बजाते हुए मात्रा गिनें (लघु=1, गुरु=2)।
  3. छोटे टुकड़ों में तोड़ें — पूरा श्लोक एक साथ न बोलकर, एक-एक पंक्ति अलग से पक्की करें।
  4. सुनकर तुलना करें — किसी शुद्ध पाठ (audio/किसी जानकार) से मिलाकर अपनी ग़लती पकड़ें।
  5. गति बढ़ाएँ — जब हर अक्षर सही बैठने लगे, तभी धीरे-धीरे स्वाभाविक गति पर लाएँ।

सूत्रमुख्य बात
1. उच्चारण-स्थानहर वर्ण सही अंग (कण्ठ/तालु/मूर्धा/दन्त/ओष्ठ) से बोलें
2. मात्रा-शुद्धताह्रस्व = 1 मात्रा, दीर्घ = ठीक 2 मात्रा
3. लघु-गुरुगुरु पर ठहराव, लघु त्वरित — यही लय बनाता है
4. संयुक्ताक्षरदोनों व्यंजन स्पष्ट बोलें, निगलें नहीं
5. अनुस्वार-विसर्गकभी न छोड़ें — नासिक्य गूँज व श्वास-ध्वनि दें
6. घोष-अघोष / अल्पप्राण-महाप्राणकंपन व साँस के झोंके का फ़र्क़ पहचानें
7. यतिछन्द के तय स्थान पर ही रुकें

इन सातों सूत्रों को एक-एक करके किसी छोटे श्लोक पर आज़माएँ — पहले धीरे, फिर अभ्यास से गति बढ़ाते हुए। कुछ ही दिनों के नियमित अभ्यास से शुद्ध उच्चारण स्वाभाविक बन जाएगा।

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