डॉ. ब्रजेशपाठक ज्यौतिषाचार्य
भारतवर्ष विभूतियों की भूमि रही है। इसमें अनेकों विद्यारत्नों ने जन्म लिया है। उन्हीं अग्रगण्य विद्यारत्नों में अपना विशेषस्थान रखने वाले जयपुर राजसभाप्रधान समीक्षाचक्रवर्ती स्वनामधन्य स्व. पण्डित मधुसूदन ओझा विद्यावाचस्पति जी विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न एवं भारतीय गूढविद्याओं के अतुल्य विद्वान् हैं। आपका जन्म बिहार राज्य के मिथिला प्रान्त के मुजफ्फरपुर जिले के गाढा नामक गाँव में श्रीकृष्णजन्माष्टमी संवत् 1923 में मृगशिरा नक्षत्र में तदनुसार 2 सितम्बर 1866 को हुआ था।
आप जयपुर राजसभा के प्रधान विद्वान् थे। आपने अपनी विद्वत्ता का लोहा केवल भारतवर्ष में ही नहीं अपितु समूचे विश्व में मनवाया। अनेकों पुरस्कार तथा उपाधियाँ आपको पाकर गौरवान्वित हो चुकी हैं। पञ्चाशत वर्षों की घोर तपस्या के फलस्वरूप आपने वैदिकविज्ञान के शोध पर आधारित 125 से भी अधिक ग्रन्थ लिखे हैं। उनमें से वृष्टिविद्याबोधक कादम्बिनी नामक निमित्तशास्त्र अपने आप में विलक्षण है। यह ग्रन्थ पर्जन्यशास्त्र का एक भाग है।
शब्दकल्पद्रुम कोष में कादम्बिनी का अर्थ दिया है मेघमाला। निश्चय ही इस ग्रन्थ के आलोडन से व्यक्ति वर्षाविज्ञान संबंधी सभी प्रकार के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक ज्ञान में निष्णात हो सकता है।
वर्षा किस समय कहाँ कितनी मात्रा में होगी इत्यादि बातों को जानने के लिए हम वृष्टिविद्याबोधक निमित्तशास्त्र का आश्रय लेते हैं।
वर्षाज्ञान के लिए चार निमित्त बताए गए हैं –
- भौम निमित्त – देश, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग प्रभृति भौतिक वस्तुओं के द्वारा वर्षा के ज्ञान होने को भौतिकनिमित्त कहते हैं।
- आन्तरिक्ष निमित्त – वायु, बादल, विद्युत्, गर्जन, तर्जन, सन्ध्या, दिग्दाह, प्रतिसूर्य, तारा, कुण्डल, आँधी, गन्धर्वनगर, इन्द्रधनुष, वायुधारणा आदि से वर्षा के ज्ञान होने को आन्तरिक्षनिमित्त कहते हैं।
- दिव्य निमित्त – सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पुच्छलतारे, सूर्य के चिह्न, सप्तनाडीचक्र, ग्रहों का उदयास्त, संक्रान्ति आदि के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने को दिव्यनिमित्त कहते हैं।
- मिश्र निमित्त – कार्तिक से आश्विन तक के बारह महीनों के प्रत्येक दिनों के तथा विशेषतः अक्षयतृतीया, आषाढ़ी-पूर्णिमा, होलिका आदि के शकुनों तथा उपर्युक्त चिह्नों से वर्षा के ज्ञान करने को मिश्रनिमित्त कहते हैं
भौमनिमित्त की अपेक्षा आन्तरिक्ष निमित्त, आन्तरिक्ष निमित्त की अपेक्षा दिव्यनिमित्त तथा दिव्यनिमित्त की अपेक्षा मिश्रनिमित्त इस प्रकार से ये निमित्त उत्तरोत्तर एक दूसरे से अधिक बलवान् हैं। क्योंकि भौमनिमित्त का फल बहुधा थोड़ी ही दूर तक होता है। आन्तरिक्ष निमित्त का फल एक जिले तक होता है। दिव्यनिमित्त का फल एक प्रान्त तक होता है और मिश्रनिमित्त का फल सर्वत्र होता है। इनमें प्रायः भौम निमित्तों से सद्योवृष्टि का ज्ञान हो जाता है।इन चारों निमित्तों के लिए विशेषकर दिव्य और मिश्रनिमित्तों की परीक्षा के लिए सर्वप्रथम खगोलीय ग्रहनक्षत्रस्थितिज्ञान होना परमावश्यक है। इसके बिना तो इन निमित्त के प्रसंगों में एक कदम भी बढाना सम्भव नहीं है।
प्राचीन समय में इस विद्या के विद्वान् उपर्युक्त चार निमित्तों के आधार पर सद्यः होने वाली एवं विलम्ब से होने वाली वर्षा का तथा इसी के आश्रय से सुभिक्ष, दुर्भिक्ष, महामारी आदि का भी बहुत समय पूर्व ही निश्चय कर लिया करते थे कि अमुक अमुक देशों में, अमुक अमुक समय पर, इतनी मात्रा में वर्षा होगी और इस प्रकार का सुभिक्ष, दुर्भिक्ष होगा। इतना ही नहीं, बल्कि वे तो अवर्षा, अल्पवर्षा, अधिवर्षा आदि के साथ ही दुर्दैव की शान्ति के लिये यथोचित प्रबन्ध भी कर लिया करते थे। आजकल के पाश्चात्य विद्वान् जो कि हमारे चारों निमित्तों के कई पदार्थों में से केवल आन्तरिक्षनिमित्त के अन्तर्गत आधे-अधूरे वायुविज्ञान का केवल सद्यो वृष्टिमात्र बताने वाले एक भाग को जानने में ही पर्याप्त व्यय करते हैं। इनकी तरह हमारे प्राचीन नैमित्तिक दैवज्ञों को इतने अपव्यय करने की न तो आवश्यकता ही होती थी और न इतना परिश्रम ही उन्हें करना पड़ता था।
वर्षाविज्ञान का यह निमित्तशास्त्र कादम्बिनी चार अध्यायों गर्भाध्याय, द्वादशमासिकाध्याय, निमित्ताध्याय तथा शकुनाध्याय + तत्कालाध्याय में विभक्त है। इनमें से तीसरा निमित्ताध्याय कुल छः अधिकारों में विभक्त है। जिसका तीसरा अधिकार है रविकराधिकार। इसमें कुल 75 श्लोक हैं। रवि का अर्थ होता है सूर्य और कर का अर्थ होता है किरण इस प्रकार इस अधिकार में वर्षाज्ञान कराने वाले सूर्यरश्मियों से उत्पन्न विकारों पर आधारित आन्तरिक्ष निमित्त के दुर्लभ सूत्रों का प्रतिपादन किया गया है।
सूर्यरश्मियों से उत्पन्न होने वाले सात विकार बताए गए हैं, यथा –
सन्ध्या च कुण्डलं शक्रायुधं दण्डस्त्रिशूलकम् ।
मत्स्योऽमोघश्च सप्तैते विकारा रविरश्मिजाः ॥ १२६॥[1]
1. सन्ध्या
2. कुण्डल
3. इन्द्रधनुष
4. दण्ड
5. त्रिशूल
6. मत्स्य
इनमें से सन्ध्या नामक विकार का वर्णन आदरणीय मधुसूदन ओझा जी ने अठारह श्लोकों में किया है। जिनमें से प्रथम दस श्लोकों पर आधारित मेरा यह व्याख्यान है।[1]
सन्ध्या काल तथा उसका का परिमाण –
सन्ध्या भवत्यहोरात्रसन्धिस्था नाडिकाद्वयी।
नाडीत्रयी वा यावद्वा ज्योतिषां दर्शनं भवेत् ॥ १२७॥[2]
दिन और रात्रि की सन्धि में दो या तीन नाड़ीमात्र के समय को सन्ध्या कहते हैं अथवा जब तक ताराओं का दर्शन हो उस काल को सन्ध्या कहते हैं।
जैसाकि सब जानते ही हैं –
- एक अहोरात्र = 60 नाडियाँ होती हैं।
घण्टे-मिनट के प्रारूप में देखें तो –
- एक नाडी = 24 मिनट होता है।
इस प्रकार दो नाडियों में –
- 24 × 2 = 48 मिनट
और तीन नाड़ियों में –
- 24 × 3 = 72 मिनट अर्थात् 1 घण्टा 12 मिनट होता है।
दो या तीन नाड़ीमात्र के समय को सन्ध्या मानने का मत गर्गाचार्य का है, बृहत्संहिता के भट्टोत्पल व्याख्यान में इसका वर्णन मिलता है।[3] ताराओं के दर्शन तक संध्या के सम्बन्ध में देवीभागवत
में उत्तमा तारकोपेता कहा ही गया है।[4]
शुभ सन्ध्या का लक्षण –
सन्ध्यायां सुरभिः शीतो मृदुश्चरति मारुतः।
शुभाय विमलं व्योम दिशः पद्मारुणप्रभाः ॥ १२८॥[5]
सन्ध्या के समय में यदि शीतल, मन्द, सुगन्धयुक्त पवन चले, आकाश निर्मल हो और दिशाएँ लालकमल की तरह प्रभा वाली हों तो शुभ समझना चाहिये।
यहाँ शुभ शब्द से क्या-क्या फल समझा जाये ? इसका ही विवरण आगे के श्लोकों में दिया गया है। सन्ध्या सम्बन्धित फल भद्रबाहुसंहिता नामक ग्रन्थ में भी विस्तार से देखने को मिलता है। विशेष ज्ञान के पिपासु लोगों को इस ग्रन्थ के साथ-साथ भद्रबाहुसंहिता के सातवें अध्याय का भी अध्ययन करना चाहिए। भद्रबाहुसंहिता के अनुसार सन्ध्या के शुभफलों में विभिन्न लक्षणों के आधार पर समाज के विभिन्न वर्गों का विजय तथा वर्षाकाल के दौरान सुभिक्षकारक वर्षा यह दो शुभफल मुख्यरूप से प्राप्त होते हैं।[6]
महामेघ का उदय बताने वाली सन्ध्या –
द्योतयन्ती दिशः सर्वा यदि सन्ध्या प्रदृश्यते।
महामेघोदयं विद्याद् वृष्टिस्तर्हि भविष्यति॥ १२९॥[7] सब दिशाओं में चमकती हुई यदि सन्ध्या दिखाई देती है तो महामेघ का उदय समझना चाहिये और वृष्टि होगी। यहाँ महामेघ शब्द से तात्पर्य है बडे, घने, काले और निश्चित रूप से वृष्टि करने वाले मेघ अर्थात् सुवृष्टिकरमेघ।

शीघ्र वर्षा सूचक सन्ध्या –
वैडूर्याम्बुजकिञ्जल्कप्रभा कुवलयप्रभा।
सन्ध्या करोति निर्वाता वृष्टिं सद्योऽर्कभासिता ॥ १३०॥[1]
यदि सन्ध्या वैडूर्यकमल और किञ्जल्क (कमल केसर) की प्रभा के सदृश तथा कुवलय (नीलकमल) की सी प्रभा वाली हो एवं वायुरहित और सूर्य से प्रकाशित हो तो शीघ्र ही वर्षा करती है।

सूर्य की किरणों से उत्पन्न वृष्टि और अनावृष्टि वाले विकार –
मत्स्यामोघपरीवेषपरिधीन्द्रायुधादिभिः
स्निग्धै रविकरैर्वृष्टिरवृष्टी रूक्षवैकृतैः॥ १३१॥[1]
- मत्स्य,
- अमोघ,
- परीवेष, परिधि (ये दोनों कुण्डल नामक विकार के भेद हैं) और
- इन्द्रधनुष, आदि स्निग्ध सूर्य की किरणों में वृष्टि होती है।
- रूक्ष और वैकृत किरणों से वृष्टि नहीं होती है।
इस श्लोक में स्निग्ध, रूक्ष और वैकृत शब्द भी प्रयुक्त हैं, आइए इनको समझते हैं –
स्निग्ध – स्निग्ध का अर्थ होता है, जलयुक्त। वैशेषिक दर्शन के अनुसार स्नेह नामक एक गुण है जो जलमात्र में रहता है। कहा गया है ‘चूर्णादिपिण्डीभावहेतुर्गुण: स्नेह:’।[1] रविकराधिकार के प्रसंग में जो सन्ध्यादि सप्तविकार बताए गए हैं, वो देखने में मनोरम लगें, आँखों को चुभने वाले न हों तथा उन लक्षणों के घटित होते समय बहने वाली हवा मन्द और शीतल (जलयुक्त हवा शीतल होती है) हो तो उन लक्षणों को स्नेहगुणयुक्त कहेंगे।
रूक्ष – बृहत्संहिता की भट्टोत्पल टीका में रूक्ष शब्द की व्याख्या करते हुए भट्टोत्पल ने लिखा है ‘रूक्षे चाङ्गानामसुखकरे‘[2] अर्थात् जो अंगों के लिए असुखकर है वो रूक्ष है। रविकराधिकार के प्रसंग में जो सन्ध्यादि सप्त विकार बताए गए हैं वो देखने में कष्टकर या भयोत्पादक लगें आँखों को चुभने वाले हों तथा उन लक्षणों के घटित होते समय बहने वाली हवा त्वचा को कष्ट देती हो तो उन लक्षणों को हम रूक्षगुणयुक्त कहेंगे।
वैकृत – शब्दकल्पद्रुम में लिखा है ‘विकृतमेव वैकृतम्’[3] अर्थात् वैकृत का अर्थ है बिगडा हुआ। रविकराधिकार के अन्तर्गत वर्णित सप्तविकार अपने वास्तविक स्वरूप एवं शुभलक्षणों से युक्त न हों बल्कि बिगडे हुए हों, विकार युक्त हों या आधे अधूरे हों तथा अशुभलक्षणों से युक्त हों तो वे ही वैकृत कहे जाएँगे। उदाहरणार्थ सप्तविकारों में से दण्ड और त्रिशूल दोनों ही अमोघ नामक विकार के बिगडे हुए रूप हैं। इसलिए ये दोनों अमोघ वैकृत के उदाहरण होंगे। अन्य विकृतियों के संबंध में भी प्रकृतग्रन्थ के रविकराधिकार प्रसंग में ही विस्तार से बताया गया है।
रविकराधिकार में जो संध्यादि सप्तविकार बताए गए हैं उनमें से सन्ध्या के सम्बन्ध कुछ चर्चा हो चुकी है और कुछ चर्चा आगे होगी। शेष छः विकारों में से चार अमोघ, मत्स्य, कुण्डल और इन्द्रधनुष इन सभी संहिता शास्त्रीय पारिभाषिक नामों के लक्षणों को प्रकृतग्रन्थ के अनुसार विस्तार से समझेंगे। अवशिष्ट दण्ड तथा त्रिशूल ये दोनों ही विकार अमोघ वैकृत हैं इसलिए इनके लक्षणों की चर्चा अमोघ विकार के प्रसंग में ही हो जाएगी। ये सभी लक्षण प्रकृत ग्रन्थ के इसी प्रकरण में आगे बताए गए हैं।
- अमोघ –
सूर्यात् समुत्थिता रेखाऽमोघ इत्यभिधीयते।
साऽग्रेण खण्डिता दण्डस्तिस्रो रेखास्त्रिशूलकम्॥[1]
अर्थात् – सूर्य से उठी हुई रेखा अमोघ कहलाती है।
- दण्ड – यह अमोघ रेखा ही यदि अग्र भाग से खण्डित हो उसका नाम दण्ड हो जाता है।
- त्रिशूल – इसी अमोघ रेखा के अग्र भाग में यदि तीन रेखाएँ हों उसका नाम त्रिशूल हो जाता है।
- मत्स्य –
द्वाभ्यामघोघरेखाभ्यां भिन्नदिग्भ्यां तु मत्स्यकः॥[2]
अर्थात् – भिन्न दिशाओं वाली दो अमोघ रेखाओं से मत्स्य विकार होता है।
श्लोक 126 में पहले बताया जा चुका है कि सूर्य किरणों के सात विकारों में से दूसरा विकार कुण्डल संज्ञक होता है।
इस कुण्डल नामक विकार के दो भेद हैं –
परिधिः परिवेषश्च कुण्डलं द्विविधं मतम्।[1]

- परिधि –
प्रत्यर्कः प्रतिचन्द्रश्च द्विविधः परिधिर्भवेत्॥[1]
सूर्य और चन्द्रमा के भेद से परिधि दो प्रकार की होती है –
- प्रत्यर्क परिधि – सूर्य के आस-पास बिल्कुल सूर्य जैसी ही एक और आकृति दिखाई दे तो उसे प्रत्यर्क परिधि कहते हैं।
- प्रतिचन्द्र परिधि – चन्द्रमा के आस-पास बिल्कुल चन्द्र जैसी ही एक और आकृति दिखाई दे तो उसे प्रतिचन्द्र परिधि कहते हैं।
- परिवेष –
रवेरिन्दोः करा व्योम्नि वायुना प्रतिमूर्छिताः।
सूक्ष्मेऽभ्रे मण्डलीभूताः परिवेशाख्यया मताः॥[2]
अर्थात् – आकाश में सूक्ष्म बादलों के अन्दर सूर्य और चन्द्रमा की जो किरणें वायु से प्रतिमूर्छित होकर गोलाकार स्वरूप में होती हैं, उन्हें परिवेष कहते हैं।
इन्द्रधनुष
नीरांतराः करा भानोः पवनेन विघट्टिताः।
सप्तवर्णा धनुःसंस्था दृष्टा इन्द्रधनुर्मतम्॥[1]
अर्थात् – सूर्य की किरणें पवन से टकराकर (वायुमण्डल में विद्यमान) जल के अन्दर प्रविष्ट हो जाती हैं जिनसे सात वर्ण वाले धनुष की स्थिति बनती है, यही इन्द्रधनुष कहलाता है।
अव्यर्थ वृष्टि योग का वर्णन –
सायं सन्ध्या सहामोघा प्रातः सन्ध्या समत्स्यका।
मेघयोगोऽयमव्यर्थो वृष्टिस्तत्र भविष्यति ॥ १३२॥[2]
प्रातः काल की सन्ध्या यदि मत्स्य विकार से युक्त और सायंकाल की सन्ध्या यदि अमोघ विकार से युक्त हो तो, यह मेघ का अव्यर्थ योग है अर्थात् उस क्षेत्र में अवश्य ही वृष्टि होगी।
अनावृष्टि और शस्त्रकोप जैसे फल देने वाली सन्ध्या –
दुष्टाकृतिघनैर्धूमैर्नीहारैः पांसुभिः पुरैः।
सन्ध्या करोत्यनावृष्टिमकाले शस्त्रकोपनम् ॥ १३३॥[3]
दुष्ट आकृति वाले बादलों से, धूएँ से, निहार (कुहासा) से, धूलकणों से और गन्धर्वपुर से युक्त सन्ध्या (वर्षा ऋतु में हो तो) अनावृष्टि तथा अकाल में (वर्षा ऋतु के अलावा अन्य किसी ऋतु में हो तो) शस्त्रकोप (उस क्षेत्र के मुखिया या राजा के लिए) करने वाली होती है।
ऋतुओं के वर्ण से युक्त सन्ध्या –
शोणा पीतो सिता चित्रा पद्माभा शोणितप्रभा ।
शिशिरादिषु सन्ध्येयं स्वर्तुप्रकृतितः शुभा ॥ १३४॥[1]
शिशिर आदि छः ऋतुओं में अपनी प्रकृति के अनुसार वर्ण वाली अर्थात् –
- शिशिर – शोणा (रक्त के समान गहरा लाल रंग)
- वसन्त – पीता (पीला रंग)
- ग्रीष्म – सिता (सफेद/उज्जल रंग)
- वर्षा – चित्रा (मिश्रित रंग)
- शरद – पद्माभा (हल्का गुलाबी+बैंगनी मिश्रित रंग)
- हेमन्त – शोणितप्रभा (रक्तिम प्रभा अर्थात् कपिल रंग) रंगों से युक्त सन्ध्या हो तो उसे शुभ समझना चाहिये।
बादलों के स्वरूप तथा के अनुसार वर्षा का ज्ञान –
पूर्वेण यदि सन्ध्यायां मेघैराच्छाद्यते नभः।
महिषोष्ट्रवराहाभैर्वृषकुञ्जरपर्वतैः ॥ १३५॥[2]
पञ्चरात्रे तदा सप्तरात्रे वा तत्र वर्षति।
ऐशान्यामीदृशैर्मेघैरर्धरात्रेण वर्षति॥ १३६॥[3]
- सन्ध्या के समय यदि पूर्व दिशा का आकाशमण्डल भैंसे, ऊँट, सूअर, बैल, हाथी या पर्वताकार वाले मेघों से अच्छादित हो तो पाँच या सात रात्रि के बाद उस क्षेत्र में वर्षा होगी ऐसा समझनी चाहिये।
- लेकिन उक्त आकार वाले मेघ यदि ईशान कोण में हों तो उसी दिन अर्धरात्रि में ही वर्षा होगी, अर्थात् शीघ्र ही वर्षा समझनी चाहिये।



