सांस्कृतिक, पौराणिक, कृषि-पारिस्थितिक एवं
ज्योतिर्वैज्ञानिक आयामों का एक समन्वित अध्ययन
(A Study of Nāgapañcamī: Cultural, Mythological, Agro-Ecological and Archaeo-Astronomical Dimensions)
शोध-आलेख (Research Paper)
प्रकाशक: हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान
अगस्त 2026
सारांश (Abstract)
भारतीय पर्व-परम्परा में नागपञ्चमी को प्रायः केवल एक धार्मिक अनुष्ठान — सर्प-पूजा का पर्व — के रूप में देखा जाता है। प्रस्तुत शोध-आलेख इस सीमित दृष्टिकोण से आगे बढ़कर नागपञ्चमी का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें पौराणिक आख्यान-परम्परा (महाभारत का सर्पसत्र एवं आस्तीक-कथा), कृषि-पारिस्थितिकी में सर्पों की भूमिका, श्रावण मास की ऋतु-सन्दर्भता, भारतीय पञ्चाङ्ग-आधारित कालगणना पद्धति, तथा समकालीन वन्यजीव-संरक्षण विधान — इन सभी को एक समन्वित ढाँचे में जोड़कर देखा गया है। अध्ययन यह प्रतिपादित करता है कि नागपञ्चमी भारतीय ज्ञान-परम्परा की उस विशेषता का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें आकाश, काल, पृथ्वी, जल एवं जीव-जगत को परस्पर सम्बद्ध मानकर देखा गया, न कि पृथक-पृथक इकाइयों के रूप में। आलेख यह भी सुझाव देता है कि परम्परा और आधुनिक वैज्ञानिक चेतना (यथा जीव-दया एवं विधिक संरक्षण) परस्पर विरोधी नहीं, अपितु पूरक हो सकते हैं।
कूटशब्द (Keywords): नागपञ्चमी, नाग-पूजा, महाभारत आस्तीक पर्व, कृषि-पारिस्थितिकी, श्रावण मास, पञ्चाङ्ग, भारतीय ज्योतिर्विज्ञान, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972

1. प्रस्तावना (Introduction)
श्रावण मास भारतीय कालगणना और सांस्कृतिक जीवन में विशेष महत्त्व रखता है। वर्षा ऋतु, कृषि-चक्र, जल, वनस्पति, नक्षत्र-परम्परा एवं धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा यह काल भारतीय जीवन-दृष्टि में प्रकृति और मानव के परस्पर सम्बन्ध को अभिव्यक्त करता है। इसी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नागपञ्चमी का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 17 अगस्त, सोमवार को पड़ता है, यद्यपि तिथि-निर्धारण एवं पूजन-विधि में क्षेत्रीय पञ्चाङ्ग-परम्पराओं के अनुसार अन्तर सम्भव है, अतः स्थानीय पञ्चाङ्ग को प्राथमिकता देना उचित माना गया है।
नागपञ्चमी को केवल “सर्प-पूजा का पर्व” कहकर सीमित कर देना इसके व्यापक सांस्कृतिक अर्थ की उपेक्षा करना होगा। भारतीय परम्परा में नाग जल, पृथ्वी, उर्वरता, संरक्षण, शक्ति एवं रहस्य के अनेक प्रतीकों से सम्बद्ध रहे हैं, और साथ ही वास्तविक सर्प भी कृषि-पारिस्थितिकी का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। इस प्रकार नागपञ्चमी में धर्म, संस्कृति, प्रकृति एवं मानव-जीवन के बीच एक अद्भुत अन्तःसम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है, जिसकी सम्यक् व्याख्या हेतु बहुविषयक (interdisciplinary) दृष्टिकोण अपेक्षित है।
2. उद्देश्य एवं अध्ययन-पद्धति (Objectives and Methodology)
प्रस्तुत शोध-आलेख के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं —
(क) नागपञ्चमी के पौराणिक, सांस्कृतिक, कृषि-पारिस्थितिक तथा ज्योतिर्वैज्ञानिक आयामों की समीक्षा करना।
(ख) महाभारत-वर्णित आस्तीक-कथा के प्रतीकात्मक एवं नैतिक निहितार्थ का विश्लेषण करना।
(ग) सर्प एवं कृषि-समाज के व्यावहारिक सम्बन्ध की पारिस्थितिक व्याख्या प्रस्तुत करना।
(घ) परम्परागत आस्था एवं आधुनिक वन्यजीव-संरक्षण विधान के मध्य समन्वय हेतु विवेकपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।
अध्ययन की पद्धति गुणात्मक एवं व्याख्यात्मक (qualitative-interpretative) है, जिसमें पौराणिक ग्रन्थों, पञ्चाङ्ग-परम्परा तथा शासकीय एवं विधिक स्रोतों का समीक्षात्मक अध्ययन कर विषय को समन्वित रूप में प्रस्तुत किया गया है।
3. नाग-पूजा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
भारतीय वाङ्मय में नागों का उल्लेख अत्यन्त प्राचीन एवं व्यापक है। अनन्त, शेष, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, कालिय आदि नाम महाभारत, पुराणों तथा विभिन्न आख्यान-परम्पराओं में सहज ही प्राप्त होते हैं। नाग केवल एक जैविक प्राणी के रूप में ही नहीं, अपितु भारतीय प्रतीक-परम्परा में भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं — कहीं वे जल एवं पृथ्वी से जुड़े दिखाई देते हैं, कहीं शक्ति और संरक्षण के प्रतीक बनते हैं, तो कहीं दैवी सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। भगवान शिव के कण्ठ में विराजमान नाग तथा भगवान विष्णु का अनन्तशेष पर शयन, भारतीय धार्मिक कला और दर्शन में नाग के प्रतीकात्मक महत्त्व को स्पष्ट करते हैं।
अतः विचारणीय प्रश्न केवल यह नहीं है कि “साँप की पूजा क्यों की जाती है?”, अपितु यह भी है कि “भारतीय समाज ने सर्प को अपने सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मानस में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान क्यों दिया?” — यह प्रश्न ही प्रस्तुत अध्ययन की मूल प्रेरणा है।
4. महाभारत में नाग एवं आस्तीक-कथा का विश्लेषण
नागपञ्चमी की सांस्कृतिक विवेचना महाभारत के आस्तीक-पर्व के उल्लेख के बिना अपूर्ण रहेगी। महाभारत के अनुसार राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई थी। इसके पश्चात् उनके पुत्र राजा जनमेजय ने नागों के सम्पूर्ण विनाश के उद्देश्य से सर्पसत्र नामक यज्ञ आरम्भ किया, जिसमें अनेक नाग अग्नि की ओर आकर्षित होने लगे। इसी समय आस्तीक मुनि — जिनका सम्बन्ध ऋषि-परम्परा एवं नागवंश दोनों से था — वहाँ पहुँचे। उन्होंने राजा जनमेजय से वर माँगा और ऐसा वर प्राप्त किया, जिससे सर्पसत्र को रोक दिया गया तथा नागों का सम्पूर्ण विनाश टल गया।
यह कथा भारतीय आख्यान-परम्परा में एक गहन नैतिक संदेश निहित रखती है —
“प्रतिशोध की अग्नि में सम्पूर्ण जीवसमुदाय का विनाश समाधान नहीं हो सकता।”
एक व्यक्ति अथवा एक घटना के कारण सम्पूर्ण जीव-जगत को दण्डित करना उचित नहीं। आस्तीक का हस्तक्षेप इस दृष्टि से अत्यन्त अर्थपूर्ण है कि भारतीय परम्परा में संयम, सह-अस्तित्व एवं जीव-जगत के प्रति उत्तरदायित्व को कथा के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। यह कथा-तत्त्व नागपञ्चमी की सांस्कृतिक स्मृति में आज भी अन्तर्निहित है।
5. नाग एवं कृषि-पारिस्थितिकी का सम्बन्ध
नागपञ्चमी को समझने के लिए भारतीय कृषि-जीवन की पृष्ठभूमि को समझना भी आवश्यक है। कृषि-प्रधान समाज में चूहे एवं अन्य कृन्तक जीव फसलों को पर्याप्त क्षति पहुँचा सकते हैं। अनेक सर्प-प्रजातियाँ खाद्य-शृंखला में कृन्तकों एवं अन्य छोटे जीवों की संख्या नियन्त्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए ग्रामीण समाज के अनुभव में सर्प केवल भय का कारण नहीं थे, अपितु वे कृषि-पारिस्थितिकी के एक सक्रिय घटक भी थे।
यही कारण है कि सर्पों के प्रति सम्मान की सांस्कृतिक भावना को केवल अन्धविश्वास के रूप में देखना समुचित नहीं होगा — यहाँ परम्परा के पीछे एक प्रत्यक्ष प्राकृतिक अनुभव भी कार्यरत प्रतीत होता है। तथापि, आधुनिक शब्दावली में नागपञ्चमी को सीधे “वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम” कहना ऐतिहासिक दृष्टि से अतिरंजित होगा। अधिक संतुलित निष्कर्ष यह है कि सर्पों के प्रति धार्मिक-सांस्कृतिक सम्मान ने मनुष्य और सर्प के सह-अस्तित्व की मानसिकता को अप्रत्यक्ष रूप से बल अवश्य दिया।
6. श्रावण मास, वर्षा ऋतु एवं नागपञ्चमी का सम्बन्ध
नागपञ्चमी के समय-निर्धारण का सम्बन्ध भी अत्यन्त रोचक है। श्रावण मास वर्षा ऋतु का प्रमुख काल है। वर्षा के कारण भूमि में नमी बढ़ती है, और अनेक जीव अपने प्राकृतिक आश्रयों से बाहर आने लगते हैं। परिणामस्वरूप, ग्रामीण क्षेत्रों में इस समय सर्पों के दृष्टिगोचर होने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। इस प्रकार वर्षा, कृषि, भूमि एवं सर्प — इन सभी का अनुभव एक ही कालखण्ड में ग्रामीण समाज के सम्मुख उपस्थित होता रहा है।
भारतीय संस्कृति ने प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तु के रूप में नहीं देखा। अनेक जीवों को धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों में स्थान देकर उनके प्रति मनुष्य के व्यवहार को भी अप्रत्यक्ष रूप से नियमित किया गया। नागपञ्चमी इसी व्यापक प्रकृति-दृष्टि का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है।
7. भारतीय ज्योतिर्विज्ञान एवं पञ्चाङ्ग-पद्धति में नागपञ्चमी
हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान की दृष्टि से नागपञ्चमी को समझने का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष भारतीय कालगणना पद्धति भी है। नागपञ्चमी किसी स्थिर ग्रेगोरियन तिथि पर आधारित पर्व नहीं है; इसका निर्धारण चन्द्र-सौर पञ्चाङ्ग में श्रावण शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के आधार पर होता है। अर्थात् यहाँ भारतीय ज्योतिर्विज्ञान की वह परम्परा दृष्टिगोचर होती है, जिसमें सूर्य की गति, चन्द्रमा की कलाएँ, तिथि, पक्ष, मास एवं ऋतु — इन सभी के समन्वित आधार पर काल का निर्धारण किया जाता है।
इस दृष्टि से नागपञ्चमी केवल धार्मिक अनुष्ठान की तिथि नहीं, अपितु भारतीय कालबोध एवं पञ्चाङ्ग-परम्परा को समझने का भी एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। भारतीय संस्कृति में पर्व केवल “दिन” नहीं होते; उनके पीछे एक व्यवस्थित कालगणनात्मक संरचना कार्यरत होती है। इसीलिए नागपञ्चमी का अध्ययन केवल धार्मिक परम्परा का अध्ययन नहीं, अपितु भारतीय कालगणना एवं सांस्कृतिक ज्योतिर्विज्ञान के अध्ययन का भी विषय बन जाता है।
8. “नाग” शब्द के बहुविध अर्थ
भारतीय परम्परा में “नाग” शब्द के अनेक अर्थ एवं प्रयोग प्राप्त होते हैं। कहीं यह वास्तविक सर्प के लिए प्रयुक्त होता है, कहीं नाग-देवता के लिए, तथा कहीं एक विशिष्ट दैवी अथवा पौराणिक सत्ता के सूचक रूप में प्रयुक्त होता है। अनन्तनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक आदि नाम मात्र जीव-वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं हैं; वे भारतीय आख्यान एवं प्रतीक-परम्परा का अभिन्न अंग हैं। भगवान शिव के साथ नाग का सम्बन्ध वैराग्य, शक्ति एवं मृत्यु पर नियन्त्रण जैसी अनेक प्रतीकात्मक व्याख्याओं से जोड़ा गया है, जबकि भगवान विष्णु का अनन्तशेष पर शयन अनन्तता एवं ब्रह्माण्डीय व्यवस्था की धार्मिक कल्पना से सम्बद्ध है।
इस प्रकार नाग भारतीय चेतना में एक साथ जीव भी है, प्रतीक भी है और पौराणिक सत्ता भी — यह त्रिविध अर्थ-व्यवस्था ही नागपञ्चमी की सांस्कृतिक गहनता का मूल आधार है।
9. जीव-दया, नैतिक विमर्श एवं वन्यजीव-संरक्षण विधान
9.1 जीवित सर्प को दूध पिलाने की प्रथा पर विमर्श
यह विषय विशेष सावधानी से समझने की आवश्यकता है। कुछ क्षेत्रों में नागपञ्चमी के अवसर पर जीवित सर्पों को पकड़कर उनके समक्ष दूध रखने अथवा उन्हें दूध पिलाने की लोक-परम्पराएँ प्रचलित रही हैं। किन्तु जीवित सर्प को पकड़ना, उसके साथ प्रदर्शन करना अथवा उसे बलपूर्वक दूध पिलाना उचित नहीं ठहराया जा सकता। सर्प सामान्यतः दूध पर निर्भर रहने वाले स्तनधारी प्राणी नहीं हैं, और उन्हें पकड़कर दूध पिलाने की प्रक्रिया उनके लिए तनावपूर्ण एवं हानिकारक सिद्ध हो सकती है।
अतः नागपञ्चमी की धार्मिक भावना को नाग-प्रतिमा के पूजन, नाग-चित्र के पूजन, नाग-देवता के प्रतीकात्मक अर्चन, मन्त्र-जप एवं प्रार्थना, तथा प्रकृति व जीव-जगत के प्रति सम्मान — इन माध्यमों से व्यक्त करना अधिक उचित प्रतीत होता है। आस्था और जीव-दया परस्पर विरोधी नहीं, अपितु परस्पर पूरक हैं —
“जिस जीव को हम पूज्य मानते हैं, उसे कष्ट न देना ही उस पूजा की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।”
9.2 विधिक ढाँचा
आज वन्यजीव संरक्षण केवल धार्मिक भावना का विषय नहीं रह गया है; भारत में इसके लिए एक सुव्यवस्थित विधिक ढाँचा भी विद्यमान है। Wild Life (Protection) Act, 1972 भारत में वन्यजीव संरक्षण का प्रमुख कानूनी आधार है, जिसके अन्तर्गत विभिन्न सर्प-प्रजातियों को संरक्षण प्राप्त है। परिणामस्वरूप, नागपञ्चमी के अवसर पर किसी सर्प को पकड़ना, उसका प्रदर्शन करना, उसे कष्ट देना अथवा उसके साथ अनुचित व्यवहार करना — केवल नैतिक दृष्टि से ही नहीं, अपितु परिस्थिति-विशेष में विधिक दृष्टि से भी समस्या उत्पन्न कर सकता है।
इसलिए वर्तमान सन्दर्भ में नागपञ्चमी का एक अत्यन्त सरल किन्तु सारगर्भित संदेश उभरता है —
“नाग की पूजा करें, नाग को परेशान नहीं।”
10. नागपञ्चमी की समकालीन बहुआयामी प्रासंगिकता
प्रस्तुत अध्ययन के आधार पर नागपञ्चमी को न्यूनतम चार पूरक स्तरों पर समझा जा सकता है —
10.1 धार्मिक स्तर
नाग-देवता के प्रति श्रद्धा तथा भारतीय धार्मिक परम्पराओं का सुचारु पालन।
10.2 सांस्कृतिक स्तर
महाभारत, पुराण, लोककथा, कला एवं साहित्य में सन्निहित नाग-परम्परा का अध्ययन एवं संरक्षण।
10.3 पर्यावरणीय स्तर
सर्पों को पारिस्थितिकी-तन्त्र के महत्त्वपूर्ण घटक के रूप में स्वीकार करना तथा उनके साथ सुरक्षित सह-अस्तित्व विकसित करना।
10.4 ज्योतिर्वैज्ञानिक स्तर
तिथि, पक्ष, मास, ऋतु एवं पञ्चाङ्ग-परम्परा के माध्यम से भारतीय कालगणना-पद्धति की सूक्ष्म समझ विकसित करना।
इन चारों पक्षों को समग्रता में देखने पर नागपञ्चमी मात्र “साँप की पूजा का दिन” नहीं रह जाती; यह भारतीय कालबोध, संस्कृति, प्रकृति-दृष्टि एवं सह-अस्तित्व की भावना को समझने का एक समृद्ध अवसर बन जाती है।
11. निष्कर्ष (Conclusion)
प्रस्तुत अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि नागपञ्चमी भारतीय ज्ञान-परम्परा की उस विशिष्टता का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें आकाश, काल, पृथ्वी, जल एवं जीव-जगत को परस्पर पृथक करके नहीं, अपितु एक अन्तःसम्बद्ध व्यवस्था के रूप में देखा गया। महाभारत की आस्तीक-कथा नैतिक संयम एवं सह-अस्तित्व का संदेश देती है; कृषि-पारिस्थितिकी सर्प-सम्मान के व्यावहारिक आधार को उजागर करती है; श्रावण मास की ऋतु-सन्दर्भता पर्व के कालिक तर्क को स्पष्ट करती है; तथा पञ्चाङ्ग-आधारित तिथि-निर्धारण भारतीय ज्योतिर्विज्ञान की वैज्ञानिक सूक्ष्मता को प्रदर्शित करता है।
अध्ययन का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि परम्परा एवं आधुनिक विवेक (जीव-दया एवं विधिक संरक्षण सहित) परस्पर विरोधी नहीं, अपितु परस्पर पूरक हो सकते हैं, बशर्ते परम्परा को उसके मूल स्रोतों, प्रतीकों एवं तर्क सहित समझा जाए। भावी शोध हेतु यह सुझाव दिया जाता है कि क्षेत्रीय पञ्चाङ्ग-भेदों, लोक-परम्पराओं की विविधता, तथा सर्प-प्रजाति-विशेष के पारिस्थितिक अध्ययन को और गहनता से अन्वेषित किया जाए।
“परम्परा का सम्मान तभी सार्थक है, जब उसके भीतर निहित ज्ञान को समझा जाए — और ज्ञान तभी पूर्ण है, जब वह हमें विवेक, संवेदना एवं सह-अस्तित्व की ओर ले जाए।”
सन्दर्भ सूची (References)
1. श्रीमहाभारतम् — आदिपर्व, आस्तीकपर्व — जनमेजय का सर्पसत्र तथा आस्तीक द्वारा सर्पसत्र का निरसन।
2. भारतीय पञ्चाङ्ग-परम्परा — श्रावण शुक्ल पंचमी तथा नागपञ्चमी का काल-निर्धारण।
3. Department of Tourism, Government of Maharashtra — नागपञ्चमी की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं कृषि-सम्बन्धी परम्पराएँ।
4. Government of India, Utsav Portal — नागपञ्चमी तथा कृषि-पारिस्थितिकी से सम्बन्धित सांस्कृतिक विवरण।
5. India Code — The Wild Life (Protection) Act, 1972 — भारत में वन्यजीव संरक्षण का विधिक आधार।
हरिहर ज्योतिर्विज्ञान संस्थान
ज्योतिर्विज्ञान • भारतीय संस्कृति • शास्त्र • अनुसन्धान • प्रकृति-बोध
परम्परा को समझें — तर्क से परखें — ज्ञान के रूप में आगे बढ़ाएँ।



