एक बात श्रीमान् को ध्यान में रखनी चाहिए कि हमारे यहाँ कालगणना की नौ पद्धतियाँ प्रचलित रही हैं। महर्षि-प्रणीत सूर्यसिद्धान्त ग्रन्थ में “नवविधकालमानानि” नाम से इन नौ कालमानों का सुव्यवस्थित वर्णन प्राप्त होता है। इनमें भी सौरमान और चान्द्रमान सर्वाधिक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक माने गए हैं — हमारा सम्पूर्ण पंचांग-गणित तथा व्रत-त्योहार इन्हीं दो मानों के आधार पर निर्धारित होते हैं।
अब प्रश्न उठता है कि जो अंग्रेजी महीने और तारीखें आज प्रचलित हैं, उनकी वास्तविकता क्या है? यहाँ स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है कि यह “काम हमारा, नाम तुम्हारा” वाला विषय है। भारतवर्ष में सदियों से प्रचलित सौरमान-पद्धति को ही अंग्रेजों ने नवीन नामकरण देकर अपनी उपज बताकर हमारे समक्ष प्रस्तुत कर दिया, और कालान्तर में हम भी यह मानने लगे कि यह विशुद्ध अंग्रेजी पद्धति है। ठीक वैसे ही जैसे मुगलकाल में हमारे अनेक स्थानों और नगरों के मूल नाम बदलकर उन्हें अरबी-फारसी-उर्दू रूप दे दिया गया, और मुगलों के जाने के इतने वर्षों बाद भी हम उन्हीं परिवर्तित नामों से पुकारते चले आ रहे हैं — यहाँ तक कि दीर्घकाल बीत जाने के कारण अधिकांश जन को उनका मूल नाम तक स्मरण नहीं रहा। ठीक इसी प्रकार अंग्रेज आक्रान्ताओं ने हमारे प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की परम्परा में भी सेंधमारी करते हुए उसे अपने नाम से प्रचलित करवा दिया। इस विषय को विस्तारपूर्वक समझने हेतु मेरे निबन्ध “संवत्सर मीमांसा” के अन्तर्गत “शक संवत महिमा” नामक लेख अवश्य देखें।
अब मूल सिद्धान्त की बात करें — जो भी त्योहार सौरमान के अन्तर्गत निर्धारित होते हैं, उनकी अंग्रेजी तारीख सदैव लगभग स्थिर रहती है, क्योंकि सूर्य की गति सर्वाधिक स्थिर एवं गणनोपयोगी है, और प्रचलित अंग्रेजी मास-व्यवस्था वस्तुतः सौरमास का ही नामान्तरित रूप है। यही कारण है कि मकर संक्रांति, वैशाखी, विश्वकर्मा पूजा, खरमास आदि पर्व प्रतिवर्ष लगभग एक ही अंग्रेजी तारीख को पड़ते हैं। इसी नियमितता के कारण सामान्य जनमानस को यह भ्रम हो जाता है कि हम इन पर्वों को अंग्रेजी तारीख के आधार पर मना रहे हैं — जबकि वास्तविकता यह है कि हमारे ये पर्व सूर्य की गति पर आधारित होकर लाखों वर्षों से चले आ रहे हैं, जबकि अंग्रेजी तिथि-प्रणाली का प्रचलन तो ईसा-मसीह के पश्चात् की देन है।
अतः विश्वकर्मा जयंती “17 सितम्बर” को नहीं, अपितु सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश (कन्या संक्रांति) के दिन मनाई जाती है — और चूँकि सूर्य की गति अत्यंत स्थिर है, इसलिए वह तिथि अंग्रेजी कैलेंडर में प्रायः 17 सितम्बर के आसपास ही स्थिर बनी रहती है।
ज्योतिर्वैज्ञानिक डॉ. ब्रजेश पाठक


