दीपावली
आइये आज जानते हैं दीपावली का महत्त्व और उसकी विशेषता जो उसे सभी पर्वों से विशिष्ट बनाती है। “दीपानाम् आवली: दीपावली:” यहाँ षष्ठी-तत्पुरुष समास है, जिसका अर्थ है दीपों का समूह। इस दिन पूरा देश दीपों की जगमगाहट से चमकता रहता है। यह पर्व पाँच दिनों तक मनाया जाता है, जो कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से शुरु होकर कार्तिक शुक्ल द्वितीया तक चलता है |

१. धनत्रयोदशी (धनतेरस ) ।
२. नरक चतुर्दशी (नरक चौदश) ।
३. दीपावली ।
४.गोवर्धन पूजा ।
५. यम द्वितीया (भैया दूज) ।
सर्वप्रथम वर्ष 2026 के लिए दीपावली के उक्त पाँचों पर्वों के दिनांकों का विचार यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
धनत्रयोदशी (धनतेरस ) – 06 नवम्बर 2026
नरक चतुर्दशी – 07 नवम्बर 2026
दीपावली – 08 नवम्बर 2026
गोवर्धन पूजा – 09 नवम्बर 2026
यम द्वितीया (भैया दूज) – 10 नवम्बर 2026
अब आइये क्रमश: इन पाँचों पर्वों के बारे में जानकर इनके महत्त्व को समझते हैं –
धनत्रयोदशी(धनतेरस) :- यहाँ जो धन शब्द आया है उसे भ्रम के कारण लोग रुपया-पैसा-समृधि समझ लेते हैं। लेकिन वास्तव में यह शब्द आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वन्तरि के लिए आया है। पुराणों के अनुसार समुद्र-मंथन के समय 14 रत्नों में से 14वें रत्न के रूप में अमृत कलश लिए हुवे भगवान धन्वन्तरि का प्रादुर्भाव हुआ था। यह धनत्रयोदशी पर्व उनकी ही जयंती के रूप में आदिकाल से मनाया जाता रहा है। शास्त्रों में कहा गया है “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” अर्थात् धर्म की साधना के लिए सर्वप्रथम शरीर की ही रक्षा की जानी चाहिए। इसलिए तो आरोग्य के देवता भागवान धन्वन्तरी के पुजन के साथ हमारा प्रकाश पर्व दीपावली प्रारंभ होता है।
इस दिन अकालमृत्यु के नाश के लिए घर के मुख्य द्वार पर आटे का दीपक जलाकर दीपदान किया जाता है।
पद्मपुराण में धनत्रयोदशी के दिन दीपदान का महत्व बताते हुए कहा गया है –
कार्तिकस्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे।
यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति ।।
अर्थात् – कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रदोष काल (शाम) में यमराज के लिए दीप जलाकर घर के बाहर रखें, इससे अकालमृत्यु का नाश होता है।
दीप जलाते समय निम्नलिखित श्लोक पढना चाहिए –
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥
साथ ही इस दिन औषधीय वृक्षों जैसे तुलसी, नीम, पीपल, बेल आदि के समक्ष दीप भी जलाया जाता है।
कार्तिक कृष्णपक्ष की द्वादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तक पांच तिथियों में रात्रि के प्रथम प्रहर में क्रमश: देवता, ब्राह्मण, गौ, घोडे, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, पूजनीय लेकिन उम्र में छोटे की तथा माता सहित मातृतुल्या पूजनीयाओं की तथा कुलवधुओं की आरती करे।
नोट – यह आरती गृहस्वामी (सपत्नीक) अथवा गृहस्वामी द्वारा निर्दिष्ट प्रतिनिधि दम्पति के द्वारा किए जाने की परम्परा विश्रुत है।
इस दिन गाय की पूजा करें, उसकी प्रार्थना करें और उसे उडद से बने हुए बडे गौग्रास के रूप में खिलाएँ। गौग्रास खिलाते समय यह श्लोक पढें –
सुरभि त्वं जगन्मातर्देवि विष्णुपदे स्थिता। सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस ॥
ततः सर्वमये देवि सर्वदेवैरलंकृते । मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि॥
इस दिन तेल का पका भोजन, स्थालीपक्व (हांडी में पका भोजन), गोदुग्ध-घी-दही-छाछ आदि का सेवन न करें (निर्णयसिन्धु में इनका निषेध लिखा है)।
आयुर्वेद के जानकर वैद्य-जन आज के दिन औषधि निर्माण और संरक्षण का कार्य भी करते हैं।
भगवान धन्वन्तरी के प्राकट्य के समय उनके हाथ में स्वर्ण-कलश था इसलिए आज के दिन सोने-चाँदी के बर्तन आदि की खरीदारी की प्रथा भी चल पड़ी।
आज के दिन कुबेर पूजन भी किया जाता है और कुबेर देवता से व्यापार वृद्धि की प्रार्थना की जाती है। आज के दिन से ही व्यापारी लोग अपना हिसाब-खाता अर्थात् बही-खाता लिखना शुरू करते हैं।
नरक चतुर्दशी (नरक चौदस) :- आज के दिन की महिमा बहुत है। आज के दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर को मार कर उसके कैद से १६००० स्त्रियों को मुक्त कराया था। सत्ययुग के राजा रन्तिदेव ने नरक यातना से बचने के लिए घोर तपस्या की थी और आज के ही दिन यमराज उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए थे। कुरुक्षेत्र में भीष्म-पितामह ने आज के ही दिन बाणों की शैया ग्रहण की थी।
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को सूर्योदय से पहले, चन्द्रमा के रहते तेल लगाकर (अभ्यंग) स्नान करें। स्नान से पहले शरीर पर तिल का तेल या सुगन्धित तेल लगाएँ। यह स्नान नरक से बचने के लिए बताया गया है। जो इस दिन अभ्यंग स्नान नहीं करता, उसके पूरे वर्ष के पुण्य नष्ट होने की बात कही गई है।
स्नान के बीच में अपामार्ग (चिरचिटा) की टहनी सिर के ऊपर तीन बार घुमाएँ और मंत्र पढ़ें –
सीतालोष्टसमायुक्त सकण्टकदलान्वित । हर पापमपामार्ग ग्राम्यमाणः पुनः पुनः॥
नोट – अपामार्ग की टहनी सिर के ऊपर घुमाने के बाद पुनः स्नान करें।
स्नान के बाद दक्षिण मुख होकर तिल मिले जल की तीन-तीन अंजलि से यमराज के नामों से तर्पण करें। नाम –
यमाय नमः।
धर्मराजाय नमः।
मृत्यवे नमः।
अन्तकाय नमः।
वैवस्वताय नमः।
कालाय नमः।
सर्वभूतक्षयाय नमः।
औदुम्बराय नमः।
दघ्नाय नमः।
नीलाय नमः।
परमेष्ठिने नमः।
वृकोदराय नमः।
चित्राय नमः।
चित्रगुप्ताय नमः।
इसके अलावा नरक चतुर्दशी के दिन भीष्मतर्पण भी किया जाता है। भीष्मतर्पण की विधि फिर कभी बताएँगे।
प्रदोष काल में मंदिर, मठ, घर, चारदीवारी, बगीचे, गली, गोशाला, घुड़साल, हाथीशाला आदि में दीप जलाएँ।
स्कन्दपुराण में अकाल मृत्यु से बचने के लिए आज के दिन यमराज को तिल तेल का दीपदान करने का विधान किया गया है।
आज के दिन यमराज के निमित्त घर के बाहर 16 छोटे दीपों के साथ एक बड़ी चौमुखी दीप जलाई जाती है। दीपकों को जलाने से पहले उनका पूजन भी कर लेना चाहिए। चौमुखी दीपक घर के बाहर यम के लिए दीपदान करना चाहिए और बाकि 16 दीपक घर के विभिन्न भागों में पितरों के स्वागत में जलाकर रखनी चाहिए। घर के बाहर चतुर्वर्तियुक्त दीपक यमराज के लिए रखते समय यह श्लोक पढें –
दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया। चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापापनुत्तये॥

दीपावली :- कार्तिक कृष्णपक्ष अमावस्या को दीपावली पर्व मनाया जाता है। इसके बारे में पुराणों में बहुत सी कथा मिलती है। विष्णुपुराण के अनुसार समुद्र-मंथन के समय आज के ही दिन लक्ष्मी जी का प्रादुर्भाव हुआ था। जनमानस में कल्पभेद से 14 वर्ष के बनवास के बाद राम जी के अयोध्या लौटने की ख़ुशी में यह पर्व मानाने की परंपरा है। आज के ही दिन धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया था। सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक आज के ही दिन हुआ था।
आज के दिन धूमधाम से भगवती लक्ष्मी व भगवान गणेश जी का षोडशोपचार पूजन किया जाता है, मीठाई बांटी जाती है। व्यापारी वर्ग इस दिन विशेष पूजन करते हैं।
स्थिर लग्नों में लक्ष्मी माता का पूजन करना धन-लक्ष्मी को स्थिरता प्रदान करता है। वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ ये चार स्थिर लग्न कहे गए हैं। इनमें भी माता लक्ष्मी का जन्म सिंह लग्न में होने से सिंह लग्न में ही भगवती लक्ष्मी माता का पूजन करना अत्यन्त ही प्रभावशाली और समृद्धिदायक होता है।
सुबह प्रत्यूष वेला में (सूर्योदय से 48 मिनट पहले) अभ्यंग (तेल मालिश करके) स्नान करें।
स्नान के बाद दैनिक देवपूजा करें, कुलदेवता का भी पूजन करें।
रोगी, बालक, आतुर के अलावा अन्य लोगों को दीपावली में दिन के समय भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में लक्ष्मी पूजन के बाद ही सुंदर वस्त्र और अलंकार धारण करके भोजन करें।
अपराह्न (दोपहर बाद) में पार्वण श्राद्ध करें, जिसमें दही, दूध, घी आदि का प्रयोग हो।
इस दिन पुरे घर को साफ पवित्र करके प्रदोष काल (शाम) में दीपदान करें और घर, मंदिर आदि सजाएँ। सर्वत्र दीपक जलाएँ। नए वस्त्र पहनें। घर के बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लें।
विधिपूर्वक लक्ष्मी गणेश का पूजन करें।
प्रदोष काल में उल्का (पटाखे आदि) हाथ में लेकर पितरों को मार्ग दिखाएँ।
आधी रात के बाद (रात्रि के तीसरे प्रहर में) घर की स्त्रियाँ सूप आदि बजाते हुए घर और आँगन से अलक्ष्मी (दरिद्रता) को बाहर निकालें।
आज की दिन महानिशा पूजन अर्थात् काली पूजन करने का भी विधान है इनका पूजन मध्यरात्रि से शुरू किया जाता है।
इतना ही नहीं आज का दिन साधकों के लिए वरदान साबित होता है। आज के दिन की गई साधना सिद्धी प्रदान करने वाली होती है।
दीपावली पर्व अभिचार कर्म के लिए भी सबसे ज्यादा उपयुक्त माना गया है।
गोवर्धन पूजा :- यह पर्व दीपावली के दुसरे दिन मनाया जाता है। इस पर्व को पुराणों में अन्नकूट भी कहा गया है। आज के दिन ही भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठा कर गाय और ग्वालों की रक्षा की थी। आज के दिन मुख्यरूप से गौ आदि पशुओं का पूजन करने और उनको मक्के का पाखर (मक्के को उबाल कर बनाया गया पशु आहार) खिलाने का विधान है। आज के दिन के सम्बन्ध में अलग अलग जगहों पर कई लोकाचार प्रचलित हैं। जिनके अनुसार लोग अपने अपने तरीकों से इस पर्व को पुरे हर्षोल्लास के साथ मानते हैं। इस दिन बली पूजा, गोवर्धन पूजा, गोक्रीड़ा आदि पूजन होते हैं।
सुबह गोवर्धन (गोबर या अन्य सामग्री से बने पर्वत) की पूजा करें। गायों को सजाएँ, उनकी पूजा करें और उनसे संबंधित कार्य करें। गोवर्धन के लिए गोबर से बनी आकृति बनाएँ।
घी और अन्न का भोग लगाएँ। यह प्रार्थना करें-
गोवर्धन घराधार गोकुलत्राणकारक। बहुबाहुकृतच्छाय गवां कोटिप्रदो भव।
गायों को सजाकर क्रीड़ा कराएँ और उनका पूजन करें।
शाम के समय (दिन के चौथे प्रहर में) पूर्व दिशा में एक खम्भे या पेड़ पर कुश और काश की रस्सी से बनी मार्गपाली बाँधें। मंत्र पढ़कर नमस्कार करें और उसके नीचे से हाथी, घोड़े (आजकल के युगानुरूप आधुनिक वाहन भी ग्राह्य होंगे) आदि निकालें।
मार्गपालि नमस्तेऽस्तु सर्वलोकसुखप्रदे। विधेयैः पुत्रदाराचैः पुनरेहि व्रतस्य मे।
नोट – राजा, ब्राह्मण, प्रजा सब इसके नीचे से निकलें तो निरोग और सुखी होते हैं। महिलाएँ मंगल माला या मंगल आरती भी इसी समय करें।
इस दिन रात्रि में द्यूत (जुआ) खेलने का भी विधान है। इसमें सिर्फ एक दांव खेलने का शास्त्रीय नियम है जिससे अपने लिए वर्ष का शुभाशुभ ज्ञात हो जाए। आजकल जो अंधाधूंध जुआ खेलने का प्रचलन है वो शास्त्र मर्यादा का हनन है।
प्रतिपदा की रात्रि में राजा बलि की पूजा करें। घर के भीतर, बड़े कमरे में रंगीन चूर्ण (पाँच रंगों) से बलि लिखकर मंडल बनाएँ। राजा बलि की प्रतिमा या चित्र बनाकर (मण्डल के बीच बली लिखा है, उस स्थान पर मानसिक रूप से बली का आवाहन करके पूजा किया जा सकता है) फल, फूल और चावल से पूजा करें। पूजन करते समय यह श्लोक पढें –
बलिराज नमस्तुभ्यं दैत्यदानववन्दित। इन्द्रशत्रोऽमराराते विष्णुसानिध्यदो भव॥
नोट – पूजन के बाद बलि के उद्देश्य से यथेष्ट दान करें।
यम द्वितीया (भैया दूज) :- यह पर्व मुख्य रूप से भैया दूज के नाम से प्रचलित है। आज के दिन बहनें अपने भाई के शत्रुओं के नाश की कामना से और जीवन भर मधुर सम्बन्ध बने रहने की कामना से गाय के गोबर द्वारा एक पूजन मंडल तैयार करती हैं और उसमें चना कूटती हैं। वह चना अपने भाइयों को खिलाती हैं उन्हें अपने लोक परंपरा के अनुसार गालियां देती हैं, उन्हें उनके कमियों से अवगत कराती हैं और फिर गाली देने के पश्चाताप स्वरुप बेर के कांटे अपने जीभ में चुभाती हैं। भाई आज के दिन फल, फूल, मिठाई और दक्षिणा देकर पैर छूकर अपने बहन का आशीर्वाद लेता है जीवन भर स्नेह बनाये रखने का भरोसा दिलाता है। यह पर्व भाई-बहन के स्नेह का बहुत महान पर्व है।
यह पर्व अपराह्न (दोपहर के बाद) में करना चाहिए।
स्नान करके यमराज का पूजन करें और उन्हें अर्घ्य दें। यम और यमुना की पूजा करें। अर्घ्य देते समय यह श्लोक पढें –
एह्येहि मार्तण्डज पाशहस्त यमान्तकालोकधरामरेश।
भ्रातृद्वितीयाकृत- देवपूजां गृहाण चार्घ्यं भगवन्नमस्ते॥
भाई अपनी बहन के घर जाकर भोजन करे, अपने घर पर नहीं। बहन के हाथ का बना भोजन करे। इससे पुष्टि, आयु और वृद्धि होती है। बहन, मौसी, बुआ, मामा की पुत्री आदि सभी बहनों के हाथ का भोजन उत्तम माना गया है।
बहन भाई को तिलक करे और बहुत स्नेह पूर्वक भोजन कराए।
भोजन के बाद पान (ताम्बूल) देना शुभ माना गया है।
जो बहन भाई को भोजन कराती है, उसे वैधव्य नहीं होता और भाई की आयु बढ़ती है।
भोजन के बाद भाई अपनी बहन को बहुत आदर पूर्वक उपहार दें, जैसे वस्त्र, अलंकार या दान।
✍© ज्योतिर्वैज्ञानिक डॉ. ब्रजेश पाठक


