रक्षाबंधन का पावन पर्व सनातन परंपरा में भाई-बहन के अटूट स्नेह और रक्षा के वचन का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को अपराह्नकाल (दोपहर बाद के समय) में मनाया जाता है। किंतु इस पर्व के लिए शास्त्रों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कठोर शर्त निर्धारित की गई है — यदि पूर्णिमा तिथि के दिन भद्रा काल विद्यमान हो, तो उस समय रक्षाबंधन का कर्म सर्वथा वर्जित माना गया है। इस विषय में शास्त्रों का स्पष्ट वचन है —

“भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।”
अर्थात् भद्रा के समय दो कार्य कदापि नहीं करने चाहिए — श्रावणी यानी रक्षाबंधन और फाल्गुनी यानी होलिका दहन। यह नियम इतना दृढ़ और सर्वमान्य है कि भद्रा की उपस्थिति में इन दोनों पर्वों का अनुष्ठान वर्जित मान जाता है। शास्त्रों के अनुसार भद्रा-दोष की उपेक्षा करके किया गया रक्षाबंधन शुभफलदायी नहीं, अपितु अनिष्टकारी माना गया है।
अनेक बार पंचांग-गणना में ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, जब पहले दिन अपराह्नकाल में भद्रा विद्यमान रहती है, जबकि दूसरे दिन पूर्णिमा तिथि केवल मुहूर्त्तत्रय (अर्थात् तीन मुहूर्तों) तक ही व्याप्त रहती है — भले ही वह पूर्णिमा अपराह्नकाल से पूर्व ही समाप्त क्यों न हो जाए। ऐसी दुविधापूर्ण परिस्थिति में शास्त्रकारों का सुस्पष्ट और सर्वमान्य निर्देश है कि रक्षाबंधन दूसरे ही दिन, अपराह्नकाल में सम्पन्न किया जाना चाहिए। इसका मूल कारण यह है कि उस समय साकल्यापादिता पूर्णिमा का अस्तित्व अपराह्नकाल में विद्यमान रहता ही है।
इस सिद्धांत की पुष्टि स्वयं ‘पुरुषार्थचिंतामणिकार’ के इस प्रामाणिक वचन से होती है —
“यदा द्वितीयापराह्णात्पूर्वं समाप्ता, तदापि ‘भद्रायां द्वे न कर्त्तव्ये’ इति भद्रायां निषेधादुत्तरैव। तत्र तिथ्यनुरोधेन अपराह्णात्पूर्वम् अनुष्ठाने अपराह्णस्य सर्वथा बाधापत्तेः, अपराह्णे ज्योतिश्शास्त्र-प्रसिद्ध-तिथ्यभावेऽपि साकल्य-बोधित-तिथि-सत्त्वात्तत्रैव अनुष्ठानम्।।”
इस वचन का सरल भावार्थ यह है कि यदि तिथि के आग्रहवश अपराह्नकाल से पूर्व ही अनुष्ठान करने का प्रयास किया जाए, तो इससे अपराह्नकाल की सर्वथा उपेक्षा हो जाएगी — जो कि शास्त्रसम्मत नहीं है। अतः भले ही ज्योतिषशास्त्र-प्रसिद्ध तिथि अपराह्नकाल में समाप्त हो चुकी प्रतीत हो, तथापि साकल्य की दृष्टि से उस तिथि का बोध अपराह्नकाल में भी बना रहता है और इसी सिद्धांत के अनुसार अनुष्ठान वहीं सम्पन्न किया जाना चाहिए। यह नियम पंचांग-शास्त्र की गहन परंपरा और सूक्ष्म विवेचन का परिणाम है, जो तिथि-निर्णय में किसी भी प्रकार की भ्रांति को दूर करता है।
~ इस वर्ष (संवत् 2083 विक्रमी)की पंचांग-स्थिति
इस वर्ष अंग्रेजी तिथि के अनुसार 27 अगस्त, 2026 ई. को श्रावणी पूर्णिमा पूर्ण रूप से अपराह्नव्यापिनी है, अर्थात् यह तिथि सम्पूर्ण अपराह्नकाल में विद्यमान रहेगी। सामान्य दृष्टि से देखा जाए तो इस दिन रक्षाबंधन मनाया जाना उचित प्रतीत होता है, किंतु इसी दिन अपराह्नकाल में भद्रादोष भी विद्यमान रहेगा। भद्रा का यह अशुभ काल प्रातः 09 घंटे 09 मिनट से आरम्भ होकर सायं 21 घंटे 28 मिनट (अर्थात् रात्रि 9 बजकर 28 मिनट) तक बना रहेगा — अर्थात् लगभग सम्पूर्ण दिन ही भद्रा के प्रभाव में रहेगा।
चूँकि भद्रा-काल में रक्षाबंधन सर्वथा निषिद्ध है, इसलिए 27 अगस्त, 2026 ई. को यह पर्व बिल्कुल भी नहीं मनाया जा सकता। यदि कोई श्रद्धालु इस दिन भद्रा की उपेक्षा करके रक्षाबंधन का अनुष्ठान करता है, तो शास्त्रों के अनुसार वह न केवल अशुभ माना जाएगा, अपितु उसका समुचित फल भी प्राप्त नहीं होगा।
अगले दिन, अर्थात् 28 अगस्त, 2026 ई. को श्रावणी पूर्णिमा सूर्योदय के पश्चात् 9 घंटे 48 मिनट तक विद्यमान रहेगी, जो कि त्रिमुहूर्त्ताधिकव्यापिनी (तीन मुहूर्तों से अधिक समय तक व्याप्त) होने से रक्षाबंधन हेतु मान्य है। इस प्रकार यह तिथि उपरोक्त शास्त्रीय सिद्धांत के अनुरूप पूर्णतः उपयुक्त और शुभ सिद्ध होती है।
~ सारांश
उपर्युक्त लेख में प्रस्तुत प्रमाणों से यह पूर्णतः स्पष्ट और शास्त्रसम्मत है कि इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त, 2026 ई. को ही, अपराह्नकाल में (भद्रा दोष से मुक्त और साकल्यापादिता पूर्णिमा का अस्तित्व विद्यमान रहने के कारण) मनाया जाना चाहिए। भद्रा-दोष से पूर्णतः मुक्त होकर, सही तिथि एवं सही मुहूर्त में बांधा गया रक्षासूत्र ही भाई-बहन दोनों के लिए दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगलकारी फल प्रदान करता है। जल्दबाजी में गलत तिथि पर किया गया अनुष्ठान न केवल शास्त्रविरुद्ध होता है, अपितु अपेक्षित फल से भी वंचित कर देता है। अतः सभी श्रद्धालुजनों से अनुरोध है कि इस वर्ष 28 अगस्त को ही, अपराह्नकाल में रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाएँ। यह सर्वथा शास्त्रसिद्ध और प्रामाणिक निर्णय है।
✍️ डॉ. ब्रजेश पाठक, ज्यौतिषाचार्य
