सूर्यसिद्धांत दृग्गणितत्व सम्पादित करना कितना उपादेय?

प्रश्नकर्ता – एकः प्रश्नः, तथा च तत्रैव मम कश्चन प्रस्तावोऽपि अस्ति।
यदि सूर्यसिद्धान्तस्य गणितप्रक्रियायां कांश्चन चरराशीन् (variables) यथोचितरूपेण समावेश्य, तत्र विद्यमानान् सूत्रान् किंचित् परिष्कृत्य वा संशोध्य, दृग्गणितेन सह सर्वथा सुसंगतं फलम् उत्पादयितुं शक्येत, तर्हि तादृशः संशोधनः केवलं शत-द्विशतवर्षपर्यन्तमेव न भवेत्, अपि तु सर्वकालिकरूपेण फलप्रदः स्यात्—इति मम जिज्ञासा।
यदि सर्वकालिकरूपेण तादृशं शुद्धीकरणं गणिततः न शक्यते, तर्हि द्विसहस्रात् त्रिसहस्रवर्षपर्यन्तमपि दृग्गणितेन सह नगण्यतममपि विचलनं न जायेत, एतादृशं सूत्रसंशोधनं कर्तुं शक्यते वा?
अर्थात्, मम प्रस्तावस्य मूलभावः अयम्—
सूर्यसिद्धान्तीयगणनापद्धतेः मूलसंरचनां सुरक्षितां स्थापयित्वा, तस्यां यथावश्यकं नूतनानां चरराशीनां वा संशोधन-घटकानां समावेशेन, दीर्घकालपर्यन्तं दृग्गणितेन सह अत्यन्तसमीचीनं सामञ्जस्यं साधयितुं किमुपायः सम्भवेत्?

अस्य प्रश्नस्य भाषानुवादः

हिन्दी अनुवाद

एक प्रश्न है, और उसी के साथ मेरा एक प्रस्ताव भी है।

यदि सूर्यसिद्धान्त की गणितीय प्रक्रिया में कुछ चरराशियों (Variables) को उचित रूप से सम्मिलित करके, उसमें विद्यमान सूत्रों का थोड़ा परिष्कार अथवा संशोधन किया जाए और उससे दृग्गणित के साथ पूर्णतः सुसंगत परिणाम प्राप्त किया जा सके, तो क्या ऐसा संशोधन केवल एक-दो शताब्दियों तक ही प्रभावी रहेगा, अथवा सर्वकाल में प्रभावी हो सकता है—यही मेरी जिज्ञासा है।

यदि सर्वकालिक रूप से ऐसा शुद्धीकरण गणितीय दृष्टि से सम्भव न हो, तो क्या ऐसे सूत्र-संशोधन की सम्भावना है जिससे दो से तीन हजार वर्षों तक भी दृग्गणित की अपेक्षा नगण्यतम विचलन ही उत्पन्न हो?

अर्थात् मेरे प्रस्ताव का मूल भाव यह है—

सूर्यसिद्धान्तीय गणना-पद्धति की मूल संरचना को सुरक्षित रखते हुए, उसमें आवश्यकतानुसार नवीन चरराशियों अथवा संशोधन-घटकों को सम्मिलित करके, दीर्घकाल तक दृग्गणित के साथ अत्यन्त सटीक सामञ्जस्य स्थापित करने का क्या कोई गणितीय उपाय सम्भव है?

उत्तर – समेऽपि अवगच्छेयु: एतदर्थं भाषया लिख्यते –
विगत २६ वर्षो से कक्षाध्यापन के दौरान सूर्यसिद्धांत रीति से, अहर्गण-साधन के आधार पर ग्रह-साधन की जो विधि बताई गई है, उसका कई बार गणित करके यह देखा है कि उक्त विधि से साधित ग्रह एवं ग्रहण पूर्णतया दृक्प्रत्यक्ष नहीं होता है। उसमें थोड़ा संस्कार करना पड़ता है।
यह संस्कार हर बार प्रत्येक ग्रह में कर लेना चाहिए, जैसा कि ग्रहलाघवकार गणेशदैवज्ञ भी कहते हैं –
“सौरोऽर्कोऽपि विधूच्चमंककलिकोनाब्जो गुरुस्त्वार्यज:…..” (१/१६)
इस श्लोक के माध्यम से
ग्रन्थरचनाकाल (१४४२ शकाब्द) में प्रचलित सिद्धान्तों से गणित करने पर कौन-कौन सा ग्रह दृक्प्रत्यक्ष हो रहा था अथवा कितना जोड़ने या घटाने पर दृक्प्रत्यक्ष हो रहा था इस बात को, (प्रत्येक सिद्धांत के आधार पर गणित करके) गणेश ने प्रकाशित किया।
उदाहरण के तौर पर, इस श्लोक के अनुसार, उस समय सूर्यसिद्धांत की विधि से साधित करने पर सूर्य और चन्द्रोच्च दृक्सिद्ध होते थे, जबकि साधित चन्द्र में ९’ कला घटा देने पर वह दृक्सिद्ध हो जाता था।
इसके अतिरिक्त शेष ग्रहों का दृक्प्रत्यक्ष सूर्यसिद्धांतविहितविधि से न होकर शेष प्रचलित सिद्धान्तों से या कुछ संस्कार करके होता है।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि आचार्य ने सूर्य सिद्धांत से ही सभी ग्रहों का दृक्साधन हो, यह आग्रह नहीं किया, अपितु जिस सिद्धांत से जिस ग्रह के दृक्प्रत्यक्ष की संभावना अधिक थी उसका आश्रय लिया।
आज इस बुद्धि
/चिन्तन-सरणि की आवश्यकता हमें भी है। ग्रहों की वेध-सिद्धि में आग्रह-बुद्धि का त्याग ही उचित है।

दूसरी बात यह है कि यदि सूर्यसिद्धांतविहितविधि से ही ग्रहों का साधन अपेक्षित हो, तब सभी ग्रहों में संस्कार अपेक्षित होगा।
केन्द्रच्युतिसंस्कार, किरणवक्रीभवनसंस्कार आदि अनेकों संस्कारों का विनियोग करण-ग्रन्थों में परवर्ती केतकर आदि आचार्यों ने किया है, जो वस्तुत: पाश्चात्यसिद्धान्तजन्यसंस्कार हैं। अर्थात् करणग्रन्थकारों ने भी (जहां कालावधि सिद्धान्तग्रन्थापेक्षया अत्यल्प मतलब अधिकतम ६००-७०० वर्ष ही
होता है) आधुनिक संस्कारों को नियोजित करना अधिक उचित समझा, बजाय इसके कि वे सूर्य सिद्धांत सदृश ग्रन्थों में उक्त विधि से प्राप्त ग्रहों में धनर्ण-संस्कार करते।
क्योंकि प्रत्येक ग्रह में इस प्रकार का जोड़-घटाव-संस्कार (बीज संस्कार) बहुत व्यावहारिक नहीं है।
इसके २ कारण हैं –
प्रथम, सिद्धान्त ग्रन्थों में सृष्ट्यादि या कल्पादि से काल-गणना के कारण कालावधि अत्यधिक होने से तदुत्पन्नग्रह में जो संस्कार किया जाएगा वह कुछ ही दिनों में सदोष होने लगेगा, अतः बारम्बार इस प्रकार के संस्कार करने से कोई दृक्सिद्ध्यर्थ स्थिर या दीर्घकालिक सूत्र का निर्माण एक बड़ी चुनौती है।
दूसरा कारण प्रथमकारणाधारित है। दीर्घकालिकसूत्राभाव में, कुछ ही काल के बाद साधित बीजों के दुष्ट हो जाने पर
बार बार बीज-संस्कार करना कोई बुद्धिमानी नहीं है।
यह बात स्वयं सूर्य सिद्धांत से ही सिद्ध होती है, जहां अधिककालावधिकगणना से संभावित दोष को दृष्टिगत करते हुए स्वयं सत्युगान्तकालिक ग्रह-स्थिति दी गई –
अस्मिन् कृतयुगस्यान्ते सर्वे मध्यगता: ग्रहा:।
विना तु पातमन्दोच्चान् मेषादौ तुल्यतां गता:।। (१/५७)

एतदर्थ ही वारम्वार प्रतियुग में सूर्यसिद्धान्तोपदेश की जो बात ग्रन्थारम्भ में कही गई –
शास्त्रमाद्यं तदेवेदं यत्पूर्वं प्राह भास्कर:।
युगानां परिवर्तेन कालभेदोऽत्र केवल:।। (१/९)
उसका निहितार्थ यही है कि मूल सिद्धान्त में भले ही अंतर न किया जाए किन्तु कालजन्यदोषपरिमार्जनार्थ नव-नवसंस्कारनियोजनार्थ इसका पौन:पुण्येन शोधपूर्ण अध्ययन आवश्यक है।
अन्यथा भास्कराचार्यादिप्रतिपादित उदयान्तरादिसंस्कार, प्रत्यब्दशुद्धि आदि अनुपपन्न हो जायेंगे।
इस विषय में पाश्चात्यों के आगे बढ़ने का कारण ही पुरातन के साग्रहप्रतिपादनप्रवृत्ति का मोहत्याग है।
ऐसी स्थिति में हमारे लिए करण-ग्रन्थ ही एकमात्र आश्रय है, जिसका अद्यतनीकरण सामन्त चन्द्रशेखर, केतकर, परमेश्वर आदि आचार्यों ने किया और आगे भी करना चाहिए, यदि अपनी परम्परा को अक्षुण्ण रखना है।

✍️ प्रो. श्यामदेवमिश्र

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